जानिये क्या है जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई, किसानों को मिलेगा लाभ
जानिये क्या है जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई, किसानों को मिलेगा लाभ
ग़ाज़ीपुर। जलवायु अनुकूल खेती पर केंद्र एवं राज्य सरकार काम कर रही हैं। वहीं कृषि विज्ञानी भी इस पर जोर दे रहे हैं। मरदह विकास खंड के चवर् गाव में इसका असर भी देखने मिल रहा है। किसानों ने खेती का पारंपरिक तरीका बदलते हुए बिना जुताई के खेती कर रहे हैं। इस जीरो टिलेज तकनीक से जहां किसानों को प्रति एकड़ 4 हजार तक की बचत हो रही है। वहीं पानी की भी बचत हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से मौसम का बदलता रूप खेती-किसानी के लिए चुनौती बनकर उभर रहा है। मौसम का अचानक बदल जाना अब एक स्थायी समस्या बनता जा रहा है। पूरे विश्व में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसमी घटनाएं खेती किसानी के सामने नई चुनौती पैदा कर रही हैं। इससे निबटने के लिए जलवायु अनुकूल खेती पर जोर दिया जा रहा है। हमेशा देखने को मिलता है कि कम बारिश के कारण किसानों की चिंता भी बढ़ रही है। जरूरत होने पर भी कई-कई दिनों तक बरसात के दिनों में भी पानी नहीं बरसता है और जब बारिश की कोई जरूरत नही होती तब बिन मौसम बारिश हो जाती है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक को अपनाया जाए। इस बीच चवर् गांव में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अमरजीत कुशवाहा किसान के यहाँ पर अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, वराणसी, तथा कृषि विज्ञान केंद्र, पी. जी कॉलेज, ग़ाज़ीपुर द्वारा एक शोध और प्रदर्शनी मे जीरो टिलेज द्वारा सीधे गेँहू की बुवाई की गयी। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, वाराणसी के डा. आर के मलिक, डा अजय पुंढीर, गोपाल पांडे जनमयजय बिवाल तथा कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक मौजूद थे। डा आर के मलिक के अनुसार जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई करने पर गेहूं की पैदावार परम्परागत बुवाई की अपेक्षा अधिक होती है। अधिक पैदावार के मुख्य कारण हैं: जीरो टिलेज मशीन से गेहूं की बुवाई 15-20 दिन पहले की जा सकती है जिससे देर से बुवाई के कारण पैदावार में होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सकती है। इस विधि से बुवाई करने पर गेहूं के पौधों के जड़ों की पकड़ अच्छी रहती है जिससे पौधा जमीन पर नहीं गिरता है। जीरो टिलेज से मृदा संरचना एवं मृदा उर्वरता बनी रहती है जिससे गेहूं के पौधे की बढ़वार अच्छी होती है। धान की कटाई ‘कम्बाइन मशीन से करने पर धान के पूरे अवशेष खेत में ही पड़े रहते हैं। ये अवशेष गेहूं की फसल में ‘मल्च’ का कार्य करते हैं जिससे पानी (नमी) का वाष्पीकरण कम होता है तथा इन अवशेषों के सड़ने से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है। जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई करने के बाद यदि वर्षा हो जाती है तो खेत में पपड़ी नहीं पड़ती है तथा फसल का अंकुरण प्रभावित नहीं होता है। वही कृषि विज्ञान केंद्र के डा ओमकार सिंह के अनुसार ज़ीरो टिलेज से पराली की समस्या का भी निदान होता है तथा कई और भी फायदे है जैसे की उत्पादन लागत में कमी धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई हेतु खेत की तैयारी में जहां परम्परागत विधि में 6-8 जुताई की आवश्यकता पड़ती है, वहीं जीरो टिलेज मशीन से बुवाई करने पर यह सम्पूर्ण कार्य बिना जुताई के ही किया जाता है। इसलिए खेत की तैयारी में लगने वाले खर्च में भारी बचत हो जाती है तथा इस प्रकार केवल खेत की तैयारी में ही लगभग 8000 से 10000 रूपये प्रति हेक्टेयर की दर से बचत की जा सकती है। साथ ही साथ समय की भी भारी बचत होती है जिसे किसान अन्य कार्यो में उपयोग कर सकते हैं। एक निष्कर्ष के अनुसार एक लीटर डीजल जलने से पर्यावरण में 2.5 किग्रा. कार्बन डाईआक्साइड पैदा होती है। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर लगभग 135-150 किग्रा. कार्बन डाइआक्साइड कम करके यह तकनीक पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाती है। कार्बनडाइआक्साइड ही वातावरण में गर्मी बढ़ने (ग्लोबल वार्मिग) का मुख्य कारण है।
Publish Date: 1 year ago
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